Content

ओल इंडिया रेडियो,:राष्ट्रीय चेनल :

Wednesday, February 13, 2008 1 comments
ऐ आइ आर भवन

ओल इंडिया रेडियो से साभार
[ From : AIR Organization ]
Caption--
August, 1983, A38zTHE SECOND INDIAN NATIONAL SATELLITE, INSAT-1B READY FOR LAUNCH FROM KENNEDY SPACE CENTRE, FLORIDA, USA.Radio networking via INSAT-I is designed to provide a reliable and high-fidelity five channel regional as well as national capability. Photo shows all radio transmitters of the All India Radio that will be provided with a 5-channel radio programme receive capability for rebroadcast.
आकाशवाणी सूच्ना एवँ प्रसारण मँत्रालव के अँतर्गत एक जन प्रसारण सेवा है.देश की जन प्रसारण सेवा की योजना , विकास एवँ रख रखाव के लिये आकाशवाणी उत्तरदायी है.भारत मेँ ध्वनि प्रसारण १९२७ मेँ निजी रेडियो क्लबोँ ने मिलकर आरँभ किया.आकाशवाणी ने १९३६ औप्चारिक तौर पर सरकारी सँस्था के रुप मेँ काम करना प्रारँभ किया
जन मानस को सूचना प्रदान करना तथा उनका मनोरँजन करना इसका स्पष्ट उद्देश्य रखा गया है .
१९४७ मेँ जब भारत स्वतँत्र हुआ, आकाशवाणी के पास छ: केन्द्रोँ तथा १८ प्रषेत्रोँ का नेटवर्क था.उस समय कवरेज़ क्षेत्रफल का २.५% तथा जनसँख्या का मात्र ११% था.
स्वतँत्रता के बाद तेजी से नेटवर्क बढता गया . आज आकाशवाणी के पास २१४ प्रसारण केन्द्रोँ के साथ १४३ मीडीयम फ्रीक्वेन्सी , ५४ हाई फ्रीक्वन्सी, १३९ एफ्. एम्. ट्रान्समीटरोँ का नेटवर्क है. कवरेज क्षेत्र ९१.३७ % है.जो सँसार के सबसे बडे लोकतँत्र राष्ट्र की ९१.३३% प्रतिशत जनसँख्या की सेवा कर रहा है.
आकाशवाणी राष्ट्रीय स्तर पर , २४ भाषाओँ एवँ १४६ बोलियोँ मेँ प्रसारण कर रहा है.जिसमेँ १७ विदेशी और १० देशी भाषाओँ मेँ प्रसारण कर रहा है.
राष्ट्रीय चेनल :
इसे, १८ मई, १९८८ को प्रारम्भ किया गया.यह लगभग ७८ प्रतिशत जनसँख्या और देश का ६४ % प्रतिशत क्शेत्र कवर करता है.इसके कार्यक्रमोँ मेँ सूचना वँ मनोरँजन का विवेकपूर्ण सम्मिश्रण है.समाचार के साथ उच्च श्रेणी का हिन्दुस्तानी, कर्नाटक व पाश्चात्य सँगीत भी प्रसारित किया जाता है.इसमेँ जाँच रीपोर्टीँग, रुपक, पत्रिकाओँ , नाटकोँ , खेल, एक उर्दु कार्यक्रम और एक विविधा जिनमेँ जनजीवन, लोग, मामलोँ और सँगीत के कार्यक्रम शामिल हैँ जो राष्ट्रीय जीवन का सँपूर्ण रुप प्रस्तुत करते हैँ ४९% सँगीत, २७% उच्चरित शब्द, १८% समाचार, ४% सँयुक्त अल्पसँख्यक भाषा कार्यक्रम और २% प्रचार को कवर करता है.
विविध भारती तथा विज्ञापन प्रसारण सेवा
इस समय देश मेँ ३६ विविध भारती तथा विज्ञापन प्रसारण केन्द्र कार्यरत हैँ . सभी केन्द्रोँ से, लोकप्रिय विविध भारती सेवा १४ घँटोँ से अधिक समय का मनोरँजन उप्लब्ध करवाती है.केन्द्र का ६० % समय फिल्म सँगीत को दिया गया है.शेष समय सुगम सँगीत, भक्ति सँगीत तथा सँक्षिप्त नाटकोँ , सँक्षिप्त वार्ताओँ, साक्षात्कारोँ इत्यादी के रुप मेँ उच्चरित कार्यक्रमोँ के लिये रखा गया है.
प्रमुख चेनलोँ पर, ग्रामीण कार्यक्रमोँ, महिला कार्यक्रमोँ,फिल्म, सुगम सँगीत, ( भारतीय तथा पास्चात्य) तथा श्रोताओँ की पसन्द, नाटकोँ एवँ अन्य लोकप्रिय कार्यक्रमोँ के लिये प्रायोजक स्वीकृत हैँ.
आकाशवाणी पर विज्ञापन देना बहुत कम खर्चीला है.देश के करोडोँ श्रोताओँ को सँदेश भिजवाने की लागत रुपय्ये ५००/- से भी कम आती है.
चेन्नई, मुँबई, गौहाटी मेँ प्रत्येक स्थान पर एक एक शोर्ट वेव ट्रान्स्मीटर विज्ञापनोँ के बिना विविध भारती सेवा को प्रसारित कर रहे हैँ
~~~~~~~~~~~~~~~~ ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
सँकलन व प्रेषण : लावण्या
Read more »

आकाशवाणी के भीष्म पितामह मेरे पापा स्वर्गीय पँडित नरेन्द्र शर्मा

Friday, September 7, 2007 11 comments
स्टुडियो मेँ चिँतन की मुद्रा मेँ पँडित नरेन्द्र शर्मा


**************************************


जब हम छोटे थे तब पता नहीँ था कि मेरे पापा जो हमेँ इतना प्यार करते थे वे एक असाधारण प्रतिभाशाली व्यक्ति हैँ जिन्होँने अपने कीर्तिमान अपने आप
बनाये और वही पापा जी, हमेँ अपनी नरम हथेलियोँ से , ताली बजाकर गीत सुनाते ....
और हमारे पापा ,
उनकी ही कविता गाते हुए हमेँ नृत्य करता देखकर मुस्कुराते थे
"राधा नाचे कृष्ण नाचे,
नाचे गोपी जन !
मन मेरा बन गया सखी री सुँदर वृँदावन .
.कान्हा की नन्ही ऊँगली पर नाचे गोवर्धन "
ये गीत पापा जी जब गाया करते थे तब शायद मेरी ऊम्र ४ या ५ बरस की रही होगी....
.और यही पापा जी आकाशवाणी , विविध भारती के भीष्म पितामह बने कार्यक्रमोँ की रुपरेखा तैयार करने मेँ स्टुडियो मेँ १८, १९ घँटोँ से ज्यादह, अपने साथीयोँ के साथ काम करते थे.
१९५६ से १९७१ तक वे आकाशवाणी से सँलग्न रहे.

जब पापा लिख रहे होते तब अम्मा हमेँ डाँटती कि " शोर मत मचाओ " अपना होम वर्क करो " तो हमारी हिम्मत न होती कि पापा जी के सामने हम कभी रेडियो चला देते ..हाँ अम्मा ,पापा जी बाहर जाते तब हम बच्चे, बीनाका गीतमाला लगाते और खुब खुश होते ये गाना सुनके,
" तीन कनस्तर पीट पीट कर गला फाड कर चिल्लाना, यार मेरे मत बुरा मान ये गाना है ना बजाना है ...तीन कनस्तर .." ;-)

जैसा रेडियोनामा का लोगो है बिलकुल वैसा रेडियो हमारे घर पे भी था .घर के फर्श की टाइल्ज़ कारँग एकदम टमाटर के लाल रँग जैसा चटख था जिसपे सुफेद और काले छीँटे थे वैसा रँग आजतक किसी घर की जमीँ का मैँने देखा नहीँ और जितना शोख लाल रँग उस घर की जमीन का था वैसा ही प्यार भरा माहौल भी कायम रहता था और हमारे पापा अम्म्मा के घर के दरवाज़े सभी के लिये दिन रात, खुले रहते थे. बडी बडी नामी हस्तियाँ वहाँ मेहमान बन कर पधारा करतीँ थीँ.मशहूर फिल्म जगत के कलाकार दिलीप कुमार साहब ने एक बेशकिमती पर्शीयन कारपेट तोहफे मेँ दी थी वही दीवाने खास यानी कि ड्राइंग रूम की शोभा थी जिसके साथ विशुध्ध भारतीय ढँग की बैठक सजाया करती थीँ मेरी अम्मा !
क्रिकेट Selector & C.C.I President दादा श्री राज सिँह जी डुँगरपुर भी आते और मुझे हथेली जितना ट्राँज़िस्टर मेरी साल गिरह पे दिया था और कहा था,

" Talents ! You must listen to my Expert comments during the Test match " ;-)

( वे मुझे टेलेन्ट्ज़ ही बुलाते हैँ और उलाहना देते हैँ कि मुझमेँ गुण तो हैँ परँतु मैँ उनका सद्`उप्योग नहीँ किया करती :-)

भारत सरकार ने ४ अन्य तकनीकी विशेषज्ञ व ईँजीनीयरोँ के साथ पापा जी को जापान और अमरीका की यात्रा पे भेजा था टेलीवीज़न के बारे मेँ जानकारी हासिल करने .
.तो जापनी रेडियोवालोँ ने एक सुँदर ट्राँज़ीस्टर पापा जी को गीफ्ट मेँ दिया था जिसे मेरी बडी बहन ( अब स्व. वासवी मोदी ) कोलेज मेँ आयी तब तक सुना करती थी पर मेरी आदत है कि मैँ जब भी रेडियो सुनूँ तब और कोई काम नहीँ करती !
..मेरा पूरा ध्यान गीत के बोल, सँगीत, उतार चढाव पे केन्द्रित रहता है और इसी कारण मुझे लाखोँ गीतोँ के बोल याद हैँ ..

पापा जी के घर का रहन सहन बहुत ही सादा हुआ करता था .
.और शाँति इतनी कि आप मान नहीँ सकते कि बँबई जैसे भीडभाड भरे शहर के एक घर मेँ आप बैठे हैँ .
.ये मेरी अम्मा की मेहनत व प्रेम का दर्पण था जो मँदिर जैसे पवित्र वातावरण को अगरबत्ती और बाग के सुगँधित फूलोँ से महकाये रखा करता था.
और इसी घर से, भारत के सुप्रसिध्ध रेडियो प्रोग्राम आकाशवाणी के सभी कार्यक्रमोँ के नाम , उनकी रुपरेखा व अन्य सारी बारिकियोँ को अँजाम देनेवाले पण्डित नरेन्द्र शर्मा,
रेडियो के जनक या भीष्म पितामह की यादेँ जुडीँ हुईँ हैँ मेरे लिये .
.जो आज भी वैसी ही फूलोँ की तरह महकतीँ हुईँ , तरोताज़ा हैँ ...
-- लावण्या


Read more »

सैलाना के शंकर बा और उनका फ़िलिप्स बहादुर ट्रांज़िस्टर

10 comments
सैलाना रतलामी सेंव के मशहूर रेल्वे जंक्शन रतलाम से महज़ बीस किमी बसा गाँव ....आबादी होगी महज़ दस - पंद्रह हज़ार। कैक्टस गार्डन और डाँग रेस की नामचीन रियासत।इसी रियासत की मुलाज़िम थे शंकर बा। मैट्रिक तक पढ़े लिखे और गाँव में भी रह कर टाइम्स आँफ़ इंडिया पढ़ते और दुनिया जहान की ख़बर की रखते।आकाशवाणी इन्दौर,बीबीसी,वाँइस आँफ़ अमेरिका सुनते शंकर बा।मालवी परिवेश में रहने वाले सादा तबियत शंकर बा सैलाना के उन गिने-चुने लोगों में से थे जिनके घर ट्रांज़िस्टर बजता था। फ़िलिप्स का नन्हा सा बहादुर माँडल ....तक़रीबन वैसा ही जैसा हाल फ़िलहाल रेडियोनामा के मास्थहैड पर लगा हुआ है।बैटरी लगती थी उसमें स्याही के दवात के पैकेट के साइज़ के बराबर।दिन भर बजता रहता शंकर बा का ट्रांज़िस्टर। कभी ओटले पर,कभी आंगन में और कभी उन के मकान के पिछवाडे के अहाते पर बज कर पूरी दुनिया को जैसे सैलाना में समेट लाता। भारत इंग्लैण्ड की वह ऐतिहासिक क्रिकेट सीरिज़ जिसमें पहली बार सुनील गावसकर का जलवा दिखाई दिया। अजीत वाड़ेकर के नुमाइंदगी में १९७१ में जीत कर लौटी भारतीय टीम के मैचों का आँखों देखा हाल सुनाते जाँन अरलाँट तो कभी दिल्ली के लाल क़िले की प्राचीर से नश्र होता स्वतंत्रता दिवस का आँखों देखा हाल जिसे सुनाते मिल्विन डिमेलो...या पौने नौ बजे नहीं और फ़िलिप्स बहादुर पर नमूदार हो गई है ये बुलंद आवाज़ें....ये आकाशवाणी है अब आप देवकीनंदन पाँडे ...अशोक वाजपेयी...इंदु वाही...ब्रज शर्मा ...रामानंदप्रसाद सिंह से समाचार सुनिये।

क्रिकेट/हाँकी मैच हो तो शंकर बा सुध-बुध भूल बैठते।जसदेव सिंह चक्रपाणि,मुरली मनोहर मंजुल,सुशील दोशी,सुरजीत सेन,सुरेश सरैया,देवराज पुरी,नरोत्तम पुरी,मनीष देव,स्कंद गुप्त (शुभा मुदगल के दिवंगत पिता)अनंत सितलवाड,राजसिंह डूंगरपुर की आवाज़ें ऐसे पहचानते जैसे ये सब उनके गाँव के किसी मोहल्ले में रहते हों।शंकर बा की सबसे बड़ी ख़ासियत ये थी कि वे अपने ट्रांज़िस्टर सैट से अपने गाँव के भोले मासूम बांशिदों को भी दुनिया भर की ख़बरों से बाख़बर करते रह्ते। एक तरह से वे ट्रांज़िस्टर सैट से प्रसारित हो रही ख़बरों और ग्राम वासियों के बीच एक सहज भाषा अभिव्यक्त देने वाले दुभाषिये बन जाते।

बीबीसी शंकर बा प्रिय रेडियो चैनल रही।भारत में आपातकाल,इंदिरा गाँधी की सत्ता में वापसी,विश्व-कप में भारत की जीत,इंदिराजी की हत्या,जनता पार्टी का सत्तासीन होना,इलाहाबाद हाईकोर्ट का इंदिराजी के ख़िलाफ़ ऐतिहासिक फ़ैसला आदि विशिष्ट प्रसारण शंकर बा के फ़िलिप्स बहादुर पर ख़ूब गूँजे और ग्राम-वासियों का सम-सामयिक घटनाक्रम से जीवंत संपर्क बनाते रहे।ओंकारनाथ श्रीवास्तव,आले हसन,रत्नाकर भारती,विश्वदीपक त्रिपाठी जैसे जाने माने प्रसारणकर्ताओं की आवाज़ शंकर बा ऐसे पहचानते थे जैसे ये सब उनके परिवार के मित्र या परिजन ही हों । १९७१ के भारत - पाकिस्तान युध्द दे दौरान बीबीसी से प्रसारित विश्व-विख्यात कार्यक्रम आजकल शुरू होते ही शंकर बा के ओटले पर ग्रामवासियों की भीड़ जमा हो जाया करती थी। उसी दौरान आकाशवाणी इन्दौर के केन्द्र निदेशक श्री जयदयाल बवेजा (श्री बवेजा कालांतर में आकाशवाणी के महानिदेशक तक पहुँचे) प्रति रात्रि एक लाइव शो किया करते थे।शंकर बा इस कार्यक्रम और बीबीसी के आजकल के लिये अपने हम-उम्रों को बाक़ायदा आमंत्रित करते और इन कार्यक्रमों का आनंद लेते।

शंकर बा हर गाँव में रहे होंगे...आपके गाँव में भी। आज जब एक फ़्लैट या घर में चार चार एम और एम पी थ्री, थ्री इन वन टेप रेकाँर्ड लगे हुए हैं लेकिन शंकर बा जैसे सदाशयी लोग कहाँ जो अपने आसपास के लोगों को समाचार - विचार से समृध्द कर सकें । वो दौर हलचलों का था लेकिन सूचना तंत्र सीमित थे लेकिन इंसानी मुहब्बतें असीम थीं । अच्छी बातों को साझा करना मज़ा देता था। रेडियो जनसंचार शब्द में जन शायद (?) इस शुभ विचार के साथ जोड़ा गया हो कि हम सब दुनिया भर के हालातों को साझा कर सकें ----- उसे जन जन का विषय बना सकें। मुझे लगता है कि शायद इसी बहाने जनपदीय जीवन में आत्मीयत जगमगाती थी----लोग मिल बैठते थे...अभावों के उस दौर में सब के घर में रेडियो तो नहीं होता था सो इस बहाने ज़िन्दगी के दुख दर्द बाँट लिया करते थे। खड़ी काँलोनियों (अपार्टमेंट्स को मै यही कहना पसंद करता हूँ) दौर में हमने वैल-फ़र्निश्ड फ़्लैट्स तो बना लिये हैं और ज़माने भर के सूचना तंत्र को अपने आसपास सजा लिया है लेकिन रेडियो के आसपास नमूदार होता वह खुलूस तो जैसे मेहमान हो गया है। शंकर बा तो अब नहीं...गुज़र गये ...वे होते तो दो ही काम कर रहे होते ...या तो बीबीसी सुन रहे होते ...आकाशवाणी से समाचार सुन रहे होते या गुनगुना रहे होते ...कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन.
Read more »

रेडियो - आशिक भगवान काका

Thursday, September 6, 2007 11 comments

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

भगवान काका लालकृष्ण आडवाणी के उलट थे । उनकी पैदाइश भी सिन्ध प्रान्त की थी । बँटवारे की फ़िरकावाराना हिन्सा और दर्द को उन्होंने साम्प्रदायिकता विरोध को अपना आजीवन मिशन बनाकर जज़्ब किया था । १९९२ - ९३ में जब जब देश भर में साम्प्रदायिक हिन्सा में हजारों निर्दोष लोग मारे गए तब महाराष्ट्र का भिवण्डी इस आग से बचा रहा । भिवण्डी साम्प्रदायिकता के लिहाज से अतिसंवेदनशील माना जाता है । साम्प्रदायिक हिन्सा का भिवण्डी का इतिहास भी था फिर भी भिवण्डी में आग नहीं भड़की यह अचरज की बात थी । भिवण्डी में सत्तर के दशक में हुए भयंकर दंगों के बाद जो मोहल्ला समितियाँ गठित हुईं उन्हें इस अचरज का पूरा श्रेय दिया जाना चाहिए । यह समितियाँ पुलिस की पहल पर बनीं शान्ति समितियाँ नहीं हैं , भगवान काका जैसे शान्ति सैनिकों और जनता की पहल पर बनीं थीं । इनकी बैठक अमन के दिनों में भी नियमित होती हैं ।
बनारस के सद्भाव अभियान के तालिमी शिबिरों में भगवान काका के सवाल होते थे - 'दूसरों' के मोहल्ले की चाय की दुकानों पर बैठते हो या नहीं ? उनके परचे और इश्तेहार पढ़ पाते हो ? ' चिट्ठेकार नीरज दीवान की तरह उर्दू लिपि पढ़ना जानने वाले तरुण कम ही मिलते थे ।
अपने गाँव की मिट्टी को एक 'पर्यटक' की नाते सही एक बार चूमने की भगवान काका की हसरत पूरी न हो सकी । सिर्फ़ धार्मिक स्थलों के दर्शन हेतु वीज़ा जारी करने की नीति उनकी हसरत के आड़े आती रही। यह नीति काका के गले तो बिलकुल नहीं उतरती थी ।
बहरहाल , रेडियोवाणी के पाठकों से काका की रेडियो - आशिकी साझा करनी है । उनका ट्रांजिस्टर जितनी देर वे जागृत हों , बजता रहता । उन दिनों 'आकाशवाणी' नामक सभी स्टेशनों के कार्यक्रमों की सूचना देने वाली एक पत्रिका छपती थी । काका को इसकी जरूरत कत्तई नहीं पड़ती थी । उन्हें आकाशवाणी और ऑल इण्डिया रेडियो की उर्दू सर्विस ही नहीं रेडियो सिलोन , बीबीसी , मॉस्कवा,पेकिंग,वॉयस ऑफ़ अमेरिका और रेडियो पाकिस्तान की समय सारिणी भी आत्मसात थी । उनकी खुद की समयबद्ध दिनचर्या , देश भर के कार्यकर्ताओं के पते याद रखना , पत्र - पत्रिकाओं में छपे लेखों की कतरनों की विषयवार फाइल बनाकर रखना आदि काका के गुण रेडियो प्रभावित रहे होंगे ।
किस समय कौन सा स्टेशन फिल्मी गीत देता है , काका से पूछिए । चाहे मध्य रात्रि के बाद हो अथवा भोर पाँच बजे के पहले । हमारे घर ' द गोल्डेन वॉयस ऑफ़ कुन्दनलाल सहगल ' नामक एलपी रेकॉर्ड आया तब मेरी बा ने काका को उसे सुनने के लिए बुलाया । 'सुरतिया जाकी मतवारी , पतली कमरिया , उमरिया बाली ' - सहगल की यह लाइन सुनकर भावविभोर काका के मुँह से निकला 'क्या वर्णन है ! '
दादा धर्माधिकारी ने जिसे ' दु:शासन पर्व ' कहा , सेन्सरशिप के उस दौर में पूरा देश रत्नाकार भारतीय और ओंकारनाथ श्रीवास्तव को बीबीसी पर सुनता था । तब भगवान काका के पास सर्वाधिक सूचनाएँ रहती थीं । खबरों के बीच खबरें जान लेने की पकड़ भी काका में थी ।
एक दौर था जब रेडियो और ट्रान्जिस्टर का लाइसेन्स रखना पड़ता था । उसकी किताब डाकखाने से जारी होती थी जिसमें 'आकाशवाणी' के तानपूरे या शुभंकर वाले टिकट हर साल लगवाने पड़ते थे । काका हमेशा समय से नवीकरण करवा लेते थे । फिर सिर्फ मीडियम वेव वाले सेटों से लाइसेंस की पाबन्दी हटी तब काका ने कुछ समय एक बैन्ड वाला सेट रखा । बीबीसी भी मीडियम वेव पर ही सुनते। उनके एक कोठरी के आवास में 'एरियल' की विशेष व्यवस्था रहती थी । मौजूदा दौर के बच्चों ने जालीदार पट्टीनुमा एरियल तो देखा ही नहीं होगा । टॉर्च का मसाला जब रोशनी देना बन्द कर देता तब उनका इस्तेमाल ट्रान्जिस्टर बजाने में करते । बैटरियाँ इस्तेमाल न करते वक्त निकाल कर रखते और उन्हें धूप में स्टील के बरतन पर रखकर उनका जीवन बढ़ाने की तकनीक भी अपनाते ।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा स्थापित जमात तरुण शान्ति सेना की पत्रिका ' तरुण मन ' और बुनियादी यक़ीन ' नामक पत्रिकाओं में काका 'यतीम' नाम से फिल्म समीक्षा लिखते थे। 'रेडियोवाणी' के लिए उनसे अनमोल खजाना मिलता ।
Read more »

http://lavanyam-antarman.blogspot.com/

Friday, August 31, 2007 5 comments
Read more »