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सैलाना के शंकर बा और उनका फ़िलिप्स बहादुर ट्रांज़िस्टर

Friday, September 7, 2007
सैलाना रतलामी सेंव के मशहूर रेल्वे जंक्शन रतलाम से महज़ बीस किमी बसा गाँव ....आबादी होगी महज़ दस - पंद्रह हज़ार। कैक्टस गार्डन और डाँग रेस की नामचीन रियासत।इसी रियासत की मुलाज़िम थे शंकर बा। मैट्रिक तक पढ़े लिखे और गाँव में भी रह कर टाइम्स आँफ़ इंडिया पढ़ते और दुनिया जहान की ख़बर की रखते।आकाशवाणी इन्दौर,बीबीसी,वाँइस आँफ़ अमेरिका सुनते शंकर बा।मालवी परिवेश में रहने वाले सादा तबियत शंकर बा सैलाना के उन गिने-चुने लोगों में से थे जिनके घर ट्रांज़िस्टर बजता था। फ़िलिप्स का नन्हा सा बहादुर माँडल ....तक़रीबन वैसा ही जैसा हाल फ़िलहाल रेडियोनामा के मास्थहैड पर लगा हुआ है।बैटरी लगती थी उसमें स्याही के दवात के पैकेट के साइज़ के बराबर।दिन भर बजता रहता शंकर बा का ट्रांज़िस्टर। कभी ओटले पर,कभी आंगन में और कभी उन के मकान के पिछवाडे के अहाते पर बज कर पूरी दुनिया को जैसे सैलाना में समेट लाता। भारत इंग्लैण्ड की वह ऐतिहासिक क्रिकेट सीरिज़ जिसमें पहली बार सुनील गावसकर का जलवा दिखाई दिया। अजीत वाड़ेकर के नुमाइंदगी में १९७१ में जीत कर लौटी भारतीय टीम के मैचों का आँखों देखा हाल सुनाते जाँन अरलाँट तो कभी दिल्ली के लाल क़िले की प्राचीर से नश्र होता स्वतंत्रता दिवस का आँखों देखा हाल जिसे सुनाते मिल्विन डिमेलो...या पौने नौ बजे नहीं और फ़िलिप्स बहादुर पर नमूदार हो गई है ये बुलंद आवाज़ें....ये आकाशवाणी है अब आप देवकीनंदन पाँडे ...अशोक वाजपेयी...इंदु वाही...ब्रज शर्मा ...रामानंदप्रसाद सिंह से समाचार सुनिये।

क्रिकेट/हाँकी मैच हो तो शंकर बा सुध-बुध भूल बैठते।जसदेव सिंह चक्रपाणि,मुरली मनोहर मंजुल,सुशील दोशी,सुरजीत सेन,सुरेश सरैया,देवराज पुरी,नरोत्तम पुरी,मनीष देव,स्कंद गुप्त (शुभा मुदगल के दिवंगत पिता)अनंत सितलवाड,राजसिंह डूंगरपुर की आवाज़ें ऐसे पहचानते जैसे ये सब उनके गाँव के किसी मोहल्ले में रहते हों।शंकर बा की सबसे बड़ी ख़ासियत ये थी कि वे अपने ट्रांज़िस्टर सैट से अपने गाँव के भोले मासूम बांशिदों को भी दुनिया भर की ख़बरों से बाख़बर करते रह्ते। एक तरह से वे ट्रांज़िस्टर सैट से प्रसारित हो रही ख़बरों और ग्राम वासियों के बीच एक सहज भाषा अभिव्यक्त देने वाले दुभाषिये बन जाते।

बीबीसी शंकर बा प्रिय रेडियो चैनल रही।भारत में आपातकाल,इंदिरा गाँधी की सत्ता में वापसी,विश्व-कप में भारत की जीत,इंदिराजी की हत्या,जनता पार्टी का सत्तासीन होना,इलाहाबाद हाईकोर्ट का इंदिराजी के ख़िलाफ़ ऐतिहासिक फ़ैसला आदि विशिष्ट प्रसारण शंकर बा के फ़िलिप्स बहादुर पर ख़ूब गूँजे और ग्राम-वासियों का सम-सामयिक घटनाक्रम से जीवंत संपर्क बनाते रहे।ओंकारनाथ श्रीवास्तव,आले हसन,रत्नाकर भारती,विश्वदीपक त्रिपाठी जैसे जाने माने प्रसारणकर्ताओं की आवाज़ शंकर बा ऐसे पहचानते थे जैसे ये सब उनके परिवार के मित्र या परिजन ही हों । १९७१ के भारत - पाकिस्तान युध्द दे दौरान बीबीसी से प्रसारित विश्व-विख्यात कार्यक्रम आजकल शुरू होते ही शंकर बा के ओटले पर ग्रामवासियों की भीड़ जमा हो जाया करती थी। उसी दौरान आकाशवाणी इन्दौर के केन्द्र निदेशक श्री जयदयाल बवेजा (श्री बवेजा कालांतर में आकाशवाणी के महानिदेशक तक पहुँचे) प्रति रात्रि एक लाइव शो किया करते थे।शंकर बा इस कार्यक्रम और बीबीसी के आजकल के लिये अपने हम-उम्रों को बाक़ायदा आमंत्रित करते और इन कार्यक्रमों का आनंद लेते।

शंकर बा हर गाँव में रहे होंगे...आपके गाँव में भी। आज जब एक फ़्लैट या घर में चार चार एम और एम पी थ्री, थ्री इन वन टेप रेकाँर्ड लगे हुए हैं लेकिन शंकर बा जैसे सदाशयी लोग कहाँ जो अपने आसपास के लोगों को समाचार - विचार से समृध्द कर सकें । वो दौर हलचलों का था लेकिन सूचना तंत्र सीमित थे लेकिन इंसानी मुहब्बतें असीम थीं । अच्छी बातों को साझा करना मज़ा देता था। रेडियो जनसंचार शब्द में जन शायद (?) इस शुभ विचार के साथ जोड़ा गया हो कि हम सब दुनिया भर के हालातों को साझा कर सकें ----- उसे जन जन का विषय बना सकें। मुझे लगता है कि शायद इसी बहाने जनपदीय जीवन में आत्मीयत जगमगाती थी----लोग मिल बैठते थे...अभावों के उस दौर में सब के घर में रेडियो तो नहीं होता था सो इस बहाने ज़िन्दगी के दुख दर्द बाँट लिया करते थे। खड़ी काँलोनियों (अपार्टमेंट्स को मै यही कहना पसंद करता हूँ) दौर में हमने वैल-फ़र्निश्ड फ़्लैट्स तो बना लिये हैं और ज़माने भर के सूचना तंत्र को अपने आसपास सजा लिया है लेकिन रेडियो के आसपास नमूदार होता वह खुलूस तो जैसे मेहमान हो गया है। शंकर बा तो अब नहीं...गुज़र गये ...वे होते तो दो ही काम कर रहे होते ...या तो बीबीसी सुन रहे होते ...आकाशवाणी से समाचार सुन रहे होते या गुनगुना रहे होते ...कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन.

10 comments:

सागर नाहर at: September 7, 2007 at 9:14 AM said...

वाह रेडियोनामा से तो कितनी भूली बिसरी बातें सामने आ रही है। आपने जो नाम बताये उनमें से कई नाम हमने नहीं सुने, या सुने भी हों तो अब याद नहीम आ रहे पर, उन दिनों के बारे में जानना बहुत अच्छा लग रहा है।
रेडियो के साथ बिताये कई पल याद आ रहे हैं।
धन्यवाद संजय भाई अपने अनुभव बाँटने के लिये। जारी रहे यह कड़ी।
॥दस्तक॥
गीतों की महफिल

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` at: September 7, 2007 at 11:10 AM said...

सँजय भाई,
बहुत अच्छा लगा आपकी रेडियो से जुडी यादोँ के बारे मेँ पढना ..हाँ ..अम्कारनाथ श्रीवास्तव अँकल और उनकी पत्नी कव्यत्री श्रीमती कीर्ति चौधरी जी हमारे घर अक्सर आया करते थ और इत्तिफाक ऐसा हुआ करता था कि जब जब वे लोग आ जाते, बिना किसी पूर्व सूचना के, उस दिन अम्मा नेचने की दाल के छोटे समोसे बनाये होते !
तो ये भी याद आ रहा है ...फिर चाचा जी बी बी सी के लिये काम करने लँदन चले गये थे और उनकी बिटिया का नाम सुकवि सुमित्रा नम्दन पम्त जी का दिया हुआ था " अतिमा " ...आ हा ...कितनी यादेँ है ....क्या भूलोँ क्या याद करूँ ! "
-- लावण्या

रवि रतलामी at: September 7, 2007 at 8:16 PM said...

सैलाना का कैक्टस गार्डन वैसे तो अब रखरखाव के कारण मृतप्रायः सा है, फिर भी आकर्षण का केंद्र अब भी बना हुआ है. रतलाम पहली दफा आने वालों को हम सैलाना घुमाने जरूर ले जाते हैं.

शंकर बा के बारे में पढ़ कर आनंद आया.

अफ़लातून at: September 7, 2007 at 9:44 PM said...

सही कहा आपने,'शंकर बा हर गाँव में थे'।सोचना विस्फोट के बाद शंकर बा वाली जमात का लोप क्यों हो गया है ?

अफ़लातून at: September 7, 2007 at 9:47 PM said...

'सोचना' नहीं 'सूचना'

Yunus Khan at: September 8, 2007 at 4:36 AM said...

रेडियोनामा के ज़रिए वही यादें सामने आ रही हैं जिनका अंदाज़ा था ।
वाक़ई नॉस्‍टेलजिया भी कितनी अजीब चीज़ है ।
यूं लगता है कि रेडियो और इसके प्रेमियों की यादों का काफिला किस कदर लंबा है ।
उम्‍मीद है कि इसी तरह हम इस कारवां को लं.......बा करते जायेंगे ।
संजय भाई बहुत मार्मिक यादें बांटीं हैं आपने ।
आपके पिताजी की यादों का इंतज़ार है ।

स्र की कलम at: July 12, 2008 at 4:09 AM said...

स्र
बहुत अच्चा लगा , पुरनि यादो मे जाना,
बस य्ही कहुन्गा - कोइ लोत दे वो बिते हुए दीन

Vivek "The Wisdom" at: September 18, 2008 at 3:52 AM said...

रेडियोनामा ने काफी पुरानी नामो से हमे परिचित करा दिया उसके लिए बहुत बहुत साधुवाद |आज भी मेरे यंहा पिताजी और मेरे चाचाजी रेडियो की न्यूज़ जरुर सुनते है और हमें बचपन में प्रेरित करते थे की बी बी सी और अन्य सम्सामिक कार्यक्रम जरुर सुनने चाहिए | रोज तो नही पर मैं जब भी अपने घर जाता हूँ तो रेडियो पर विविध भारती ,बी बी सी और समाचार सुनना नही भूलता हूँ

दिलीप कवठेकर at: October 4, 2008 at 12:53 PM said...

ये अनुभव याने दिल की किताब में रखे सुखे हुए फ़ूल.या किसी के नसीब से सिर्फ़ सुखे़ पत्ते.

मगर
कितने गुमगश्ता बहारों का पता देते है,
स़ह़ने गुलशन में ये सूख़े हुए पत्ते यारों....

Vijay Singh Saharan at: August 29, 2013 at 5:41 AM said...

बिलकुल सही लिखा.रेडियो नामा ने बचपंन की यादे ताज़ा कर दी,कभी हमारी सुबह भी बीबीसी के नमस्कार भारत से हुआ करती थी,, दोपहर को विविध भारती का पिटारा और शाम फिर वाही बीबीसी के आजकल के साथ...अचला जी की आवाज़ आज भी कानों में गूंज रही है.
धन्यवाद

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